सरकार के भरोसे न बचेगी गौरैया

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प्रभुनाथ शुक्ल
गौरैया हमारी प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फुदकती और बिखेरे गए चावल या अनाज के दाने को चुगती। कभी घर की दीवार पर लगे आईने पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती दिख जाती। एक वक्त था जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोंसले लटके होते लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई है।
हालांकि पर्यावरण के प्रति जागरूकता के चलते हाल के सालों में यह दिखाई देने लगी है। गौरैया इनसान की सच्ची दोस्त भी है और पर्यावरण संरक्षण में उसकी खासी भूमिका भी है। दुनिया भर में पिछले दिनों मार्च गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाया गया। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर के प्रयासों से इस दिवस को चुलबुली चंचल गौरैया के लिए रखा गया। 2010 में पहली बार यह दुनिया में मनाया गया। गौरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इनसान की भोगवादी संस्कृति ने हमें प्रकृति और उसके सहचर्य से दूर कर दिया है। गौरैया एक घरेलू और पालतू पक्षी है। यह इनसान और उसकी बस्ती के पास अधिक रहना पसंद करती है। पूर्वी एशिया में यह बहुतायत पायी जाती है। यह अधिक वजनी नहीं होती। इसका जीवनकाल दो साल का होता है। यह पांच से छह अंडे देती है।
आंध्र यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में गौरैया की आबादी में 60 फीसदी से अधिक की कमी बताई गई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन आफ बर्ड्स ने इस चुलबुले और चंचल पक्षी को रेड लिस्ट में डाल दिया है। दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है। गौरैया की घटती आबादी के पीछे मानव विकास सबसे अधिक जिम्मेदार है। गौरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है लेकिन इसे वीवरपिंच परिवार का भी सदस्य माना जाता है। इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। इसका वजन 25 से 35 ग्राम तक होता है। यह अधिकांश झुंड में रहती है। यह अधिक दो मील की दूरी तय करती है। गौरैया को अंग्रेजी में पासर डोमेस्टिक्स के नाम से बुलाते हैं।
मानव जहां-जहां गया, गौरैया उसका हमसफर बनकर उसके साथ गयी। शहरी हिस्सों में इसकी छह प्रजातियां पाई जाती हैं, जिसमें हाउस स्पैरो, स्पेनिश, सिंउ स्पैरो, रसेट, डेड और टी स्पैरो शामिल हैं। यह यूरोप, एशिया के साथ अफ्रीका, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के अधिकतर हिस्सों में मिलती है। गौरैया घास के बीजों को अपने भोजन के रूप में अधिक पसंद करती है। इस पक्षी को बचाने के लिए वन और पर्यावरण मंत्रालय की ओर से कोई खास पहल नहीं दिखती। दुनिया भर के पर्यावरणविद् इसकी घटती आबादी पर चिंता जाहिर कर चुके हैं।
बढ़ती आबादी के कारण जंगलों का सफाया हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में पेड़ काटे जा रहे हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों में बाग-बगीचे खत्म हो रहे हैं। इसका सीधा असर इन पर दिख रहा है। गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। जिसका कारण है कि मकानों में गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे। उसमें लकड़ी और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक वातावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते थे लेकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती। यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता। गगनचुम्बी इमारतें और संचार क्रांति इनके लिए अभिशाप बन गयी। शहर से लेकर गांवों तक मोबाइल टावर एवं उससे निकलते रेडिएशन से इनकी जिंदगी संकट में है।
खेती-किसानी में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग बेजुबान पक्षियों और गौरैया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। केमिकल युक्त रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से कीड़े-मकोड़े भी विलुप्त हो चले हैं। जिससे गौरैयों के लिए भोजन का भी संकट खड़ा हो गया है। दूसरा बड़ा कारण मकर संक्रांति पर पतंग उत्सवों के दौरान काफी संख्या में हमारे पक्षियों की मौत हो जाती है। हवाई मार्गों की जद में आने से भी इनकी मौत हो जाती है। हिंसक पक्षी जैसे बाज़ इत्यादि हमला कर उन्हें मौत की नींद सुला देते हैं। गौरैया, गिद्ध के बाद सबसे संकटग्रस्त पक्षी है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर नासिक से हैं और वह बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े हैं। उन्होंने यह मुहिम 2008 से शुरू की थी। आज यह दुनिया के 50 से अधिक मुल्कों तक पहुंच गयी है। दिलावर के विचार में गौरैया संरक्षण के लिए लकड़ी के बुरादे से छोटे-छोटे घर बनाए जाएं और उसमें खाने की भी सुविधा भी उपलब्ध हो। घोंसले सुरक्षित स्थान पर हों, जिससे गौरैयों के अंडों और चूजों को हिंसक पक्षी और जानवर शिकार न बना सकें। सिर्फ सरकार के भरोसे हम गौरैया को नहीं बचा सकते। स्कूली पाठ्यक्रमों में हमें गौरैया और दूसरे पक्षियों को शामिल करना होगा।

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