सुविधा की पोशाक

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भारतीय ओलिंपिक संघ (आईओए) ने महिला एथलीटों की परेड पोशाक में बदलाव करने का फैसला किया है। अब से वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट के उद्घाटन समारोह में साड़ी नहीं पहनेंगी। साड़ी और ब्लेजर के बजाय वहां वे ब्लेजर और ट्राउजर्स में नजर आएंगी। आईओए ने यह कदम कई खिलाडिय़ों से विचार-विमर्श के बाद उठाया है और कुछेक को छोड़कर ज्यादातर खिलाडिय़ों ने इसका स्वागत किया है। निश्चय ही यह समय के अनुरूप और व्यावहारिक फैसला है। महिला खिलाड़ी अपने-अपने खेलों के लिए अलग-अलग पोशाक पहनती हैं, जो उस खेल के हिसाब से निर्धारित की गई होती है। लेकिन उद्घाटन समारोह जैसे औपचारिक मौके पर उन्हें साड़ी जैसा परिधान पहनना होता है, जिसकी वे आमतौर पर अयस्त नहीं होतीं। गौर करने की बात है कि उन्हें साड़ी पहनकर खड़े नहीं रहना होता, बल्कि काफी दूर चलना भी पड़ता है, जिसमें उन्हें परेशानी होती है। ऐसे मौकों पर वे प्राय: असहज हो जाती हैं।
लंबी कूद में देश का नाम रोशन करने वाली अंजू बॉबी जार्ज ने इस संबंध में अपना अनुभव व्यक्त किया है। 2004 ओलिंपिक में वह भारतीय दल की कप्तान थीं। उनका कहना है कि साड़ी पहने हुए तिरंगा लेकर चलना उनके लिए काफी मुश्किल साबित हुआ। उन्होंने कहा कि हर कदम पर मुझे लग रहा था कि मैं गिर जाऊंगी। इस तनाव के कारण मैं हाथ हिलाना भी भूल गई। यह सही है कि साड़ी भारतीय महिलाओं की परंपरागत पोशाक रही है। एक तरह से यह भारतीय स्त्री की पहचान है, और किसी अंतरराष्ट्रीय आयोजन में हम अपनी पहचान या प्रतीक के साथ ही उपस्थित होते हैं। लेकिन खुद यह देखना और दुनिया को दिखाना भी जरूरी है कि हमारे सामाजिक जीवन में कितना बदलाव आया है। साड़ी उस दौर का परिधान है, जब ज्यादातर औरतें घर के भीतर रहती थीं या ऐसे काम करती थीं, जिसमें साड़ी पहनकर आना सुविधाजनक होता था।
मगर समय के साथ वे घर से बाहर निकलीं और वे तमाम काम करने लग गईं जिनमें पहले पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था। अपने कामकाज और नई जीवन प्रणाली के मुताबिक भारतीय महिलाओं ने अब आधुनिक पोशाकों के साथ भी लय बिठा ली है। अब वे जरूरत और सहूलियत के हिसाब से कई तरह के कपड़े पहनती हैं। ऐसे में हमें ड्रेस कोड को लेकर भी लचीला रुख अपनाना चाहिए और सिर्फ ड्रेस में ही नहीं, अन्य स्तरों पर भी जो प्रतीक रूढ़ हो गए हैं, उनसे छुटकारा पा लेना चाहिए। सरकारी विज्ञापनों में आज भी हिंदू को टीके और चुटिया से, मुस्लिम को दाढ़ी और नमाजी टोपी से, जबकि ईसाई को हैट से दर्शाया जाता है, जबकि सामाजिक जीवन में ऐसे प्रतीकों का कोई वजन नहीं रह गया है। याद रहे, सयता वही आगे बढ़ती है, जो अपने प्रतीक बदलने के लिए हमेशा तैयार रहती है।
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